हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 8.5.13

कांड 8 → सूक्त 5 → मंत्र 13 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 5
नैनं॑ घ्नन्त्यप्स॒रसो॒ न ग॑न्ध॒र्वा न मर्त्याः॑ । सर्वा॒ दिशो॒ वि रा॑जति॒ यो बिभ॑र्ती॒मं म॒णिम् ॥ (१३)
तिलक वृक्ष से निर्मित मणि धारण करने वाले को अप्सराएं, गंधर्व और मनुष्य कोई नहीं मार पाता है, वह सभी दिशाओं का स्वामी होता है. (१३)
No one can kill apsaras, Gandharvas and human beings who wear a gem made from tilak tree, he is the swami of all directions. (13)