हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 9
कुत॒स्तौ जा॒तौ क॑त॒मः सो अर्धः॒ कस्मा॑ल्लो॒कात्क॑त॒मस्याः॑ पृथि॒व्याः । व॒त्सौ वि॒राजः॑ सलि॒लादुदै॑तां॒ तौ त्वा॑ पृच्छामि कत॒रेण॑ दु॒ग्धा ॥ (१)
विराट्‌ के दोनों वत्स कहां से उत्पन्न हुए? उन में से एक किसी लोक से उत्पन्न हुआ. उन में से पृथ्वी से कौन सा वत्स उत्पन्न हुआ? विराट्‌ के दोनों वत्स जल से निकले. मैं तुम से पूछता हूं कि तुम ने इन्हें किस प्रकार समझा है. (१)
Where did virat's two vatsa originate? One of them originated from some folk. Which of them originated from the earth? Both of Virat's vats came out of the water. I ask you how you have understood them. (1)

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 9
यो अक्र॑न्दयत्सलि॒लं म॑हि॒त्वा योनिं॑ कृ॒त्वा त्रि॒भुजं॒ शया॑नः । व॒त्सः का॑म॒दुघो॑ वि॒राजः॒ स गुहा॑ चक्रे त॒न्वः परा॒चैः ॥ (२)
जिस ने जल को महत्त्व देते हुए, क्रंदन किया और जल को त्रिभुज बना कर सोता रहा. विराट्‌ का यह वत्स अभिलाषा पूर्ण करने वाला है. उस ने दूसरों के शरीर को अपनी गुफा बनाया है. (२)
Who gave importance to water, cried and slept by making water a triangle. This vatsa desire of Virat is going to fulfill. He has made the bodies of others his cave. (2)

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 9
यानि॒ त्रीणि॑ बृ॒हन्ति॒ येषां॑ चतु॒र्थं वि॑यु॒नक्ति॒ वाच॑म् । ब्र॒ह्मैन॑द्विद्या॒त्तप॑सा विप॒श्चिद्यस्मि॒न्नेकं॑ यु॒ज्यते॒ यस्मि॒न्नेक॑म् ॥ (३)
इन में से तीन बृहती एवं महत्त्वपूर्ण हैं तथा चौथी वाणी है. विद्वान्‌ ब्रह्मा ने इस वाणी को तपस्या के द्वारा जाना. एकाकी रहने वाला ही इन में से एक को जान सकता है. (३)
Three of these are great and important and the fourth is speech. The scholar Brahma came to know this speech through penance. Only a lonely person can know one of them. (3)

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 9
बृ॑ह॒तः परि॒ सामा॑नि ष॒ष्ठात्पञ्चाधि॒ निर्मि॑ता । बृ॒हद्बृ॑ह॒त्या निर्मि॑तं॒ कुतोऽधि॑ बृह॒ती मि॒ता ॥ (४)
बृहती से पांच सोम निर्मित हुए. इन में छठे से पांच का निर्माण हुआ. अर्थात्‌ ब्रह्म से पांच तत््व-पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश की उत्पत्ति हुई. बृहत्‌ बृहती से उत्पन्न हुआ तो बृहती निर्मित कैसे हुई? (४)
Five Somas were made from Brihati. Of these, six to five were built. That is, five elements - earth, water, fast, air and sky - originated from Brahman. If it was born of great britai, how was brihati created? (4)

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 9
बृ॑ह॒ती परि॒ मात्रा॑या मा॒तुर्मात्राधि॒ निर्मि॑ता । मा॒या ह॑ जज्ञे मा॒याया॑ मा॒याया॒ मात॑ली॒ परि॑ ॥ (५)
बृहती मात्राओं अर्थात्‌ पंचतन्मात्राओं से बढ़ कर है, क्योंकि पंच तन्मात्राएं अपनी माता प्रकृति से जन्मती हैं. ये माया से ही उत्पन्न हुई. इस प्रकार मातली माया से महान है. (५)
The greater quantities i.e. panchatanmatras, because the five tanmatras are born from their mother nature. It originated from Maya. Thus Matli is greater than Maya. (5)

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 9
वै॑श्वान॒रस्य॑ प्रति॒मोपरि॒ द्यौर्याव॒द्रोद॑सी विबबा॒धे अ॒ग्निः । ततः॑ ष॒ष्ठादामुतो॑ यन्ति॒ स्तोमा॒ उदि॒तो य॑न्त्य॒भि ष॒ष्ठमह्नः॑ ॥ (६)
यह द्यौ वैश्वानर अग्नि पर ही स्थित है. धरती और आकाश जहां तक हैं, वहीं तक अग्नि देव बाधा पहुंचा सकते हैं. दिन के छठे भाग से स्तोत उत्पन्न हुआ. उस छठे भाग से ये आते हैं. (६)
It is located on the Dyau Vaishnavar agni. As far as the earth and sky are, agni god can obstruct. Stota originated from the sixth part of the day. They come from that sixth part. (6)

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 9
षट्त्वा॑ पृच्छाम॒ ऋष॑यः कश्यपे॒मे त्वं हि यु॒क्तं यु॑यु॒क्षे योग्यं॑ च । वि॒राज॑माहु॒र्ब्रह्म॑णः पि॒तरं॒ तां नो॒ वि धे॑हि यति॒धा सखि॑भ्यः ॥ (७)
हे कश्यप ऋषि! आप युक्त और योग्य को संयुक्त करते हैं. हम छः ऋषि तुम से पूछते हैं कि विराट्‌ को ब्रह्म का पिता क्यों कहा जाता है. इन सखाओं को उस ब्रह्म का उपदेश करो. (७)
O Sage Kashyap! You combine containing and qualified. We six sages ask you why Virat is called the father of Brahman. Preach that Brahman to these sakhas. (7)

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 9
यां प्रच्यु॑ता॒मनु॑ य॒ज्ञाः प्र॒च्यव॑न्त उप॒तिष्ठ॑न्त उप॒तिष्ठ॑मानाम् । यस्या॑ व्र॒ते प्र॑स॒वे य॒क्षमेज॑ति॒ सा वि॒राडृ॑षयः पर॒मे व्यो॑मन् ॥ (८)
जिस के अनुपस्थित होने पर यज्ञ नहीं होते तथा जिस के उपस्थित होने पर यज्ञ का अनुष्ठान होता है, जिस से संबंधित व्रत होने पर यज्ञ प्राप्त होता है, उसी विराट्‌ के परम व्योम में होने की बात कही जाती है. (८)
The one who is absent does not perform the yajna and the one who is present is the ritual of yajna, the one who receives the yajna when the related fast is received, the same Virat is said to be in the supreme vyom. (8)
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