हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 9.13.18

कांड 9 → सूक्त 13 → मंत्र 18 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 13
या म॒ज्ज्ञो नि॒र्धय॑न्ति॒ परूं॑षि विरु॒जन्ति॑ च । अहिं॑सन्तीरनाम॒या निर्द्र॑वन्तु ब॒हिर्बिल॑म् ॥ (१८)
जो अस्थियां गांठों का निर्माण करती हैं तथा जो मज्जा अर्थात्‌ चर्बी से स्निग्ध होती हैं, वे तुम्हें हानि न पहुंचाती हुई और नीरोग रहती हुई तुम्हारे शरीर का त्याग न करें. (१८)
The bones that form lumps and which are absorbed with marrow i.e. fat, do not harm you and leave your body while remaining healthy. (18)