अथर्ववेद (कांड 9)
यत्रा॑ सुप॒र्णा अ॒मृत॑स्य भ॒क्षमनि॑मेषं वि॒दथा॑भि॒स्वर॑न्ति । ए॒ना विश्व॑स्य॒ भुव॑नस्य गो॒पाः स मा॒ धीरः॒ पाक॒मत्रा वि॑वेश ॥ (२२)
जहां पक्षी कर्मो के अमृत के समान स्वादिष्ट फल समझते हैं, वे ही संसार की रक्षा करते हैं और अंत में सूर्यलोक में प्रवेश करते हैं. (२२)
Where birds consider delicious fruits like the nectar of karma, they protect the world and finally enter the sunland. (22)