अथर्ववेद (कांड 9)
गौरिन्मि॑माय सलि॒लानि॒ तक्ष॑ती॒ एक॑पदी द्वि॒पदी॒ सा चतु॑ष्पदी । अ॒ष्टाप॑दी॒ नव॑पदी बभू॒वुषी॑ स॒हस्रा॑क्षरा॒ भुव॑नस्य प॒ङ्क्तिस्तस्याः॑ समु॒द्रा अधि॒ वि क्ष॑रन्ति ॥ (२१)
इस वाणीरूपी गौ ने ही विश्व की रचना की है. यही जल का निर्माण करती है. मध्यम के साथ एकत्व प्राप्त कर के यह सूर्य के साथ एकपदी, दिशाओं के साथ चतुष्पदी और अंतर्दिशाओं के साथ अष्टपदी होती है. दिशाओं, विदिशाओं एवं सूर्य के साथ यह नवपदी हो जाती है. यह अविभक्त आत्मा में मिल कर भुवन की रचना करती है. इसी के कारण मेघ वर्षा करते हैं. (२१)
This speech-like cow has created the world. This creates water. By attaining unity with the medium, it is one-sided with the sun, quadrupedi with directions and ashtapadi with interdirections. With directions, vidishas and sun, it becomes Navpadi. It combines with the undivided soul and creates Bhuvan. Due to this, clouds rain. (21)