हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 9.3.4

कांड 9 → सूक्त 3 → मंत्र 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 3
वं॒शानां॑ ते॒ नह॑नानां प्राणा॒हस्य॒ तृण॑स्य च । प॒क्षाणां॑ विश्ववारे ते न॒द्धानि॒ वि चृ॑तामसि ॥ (४)
हे सब के द्वारा वरण करने योग्य शाला! तेरे बांसों के बंधनों की, लकड़ियों की, तिनकों की तथा वृक्षों की जो गांठे हैं, मैं उन्हें खोलता हूं. (४)
O school that is acceptable to all! I open the knots of your bamboos, of wood, of straws and of trees. (4)