अथर्ववेद (कांड 9)
सं॑दं॒शानां॑ पल॒दानां॒ परि॑ष्वञ्जल्यस्य च । इ॒दं मान॑स्य॒ पत्न्या॑ न॒द्धानि॒ वि चृ॑तामसि ॥ (५)
मैं मान की पत्नी अर्थात् शाला के द्वारा बांधे गए संदेशों के, पलदों के, परिष्यंद के तथा वृणो के बंधनों को खोलता हूं. (५)
I open the bonds of messages, palms, refinements and trees tied by Mann's wife, that is, the school. (5)