हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 9.5.24

कांड 9 → सूक्त 5 → मंत्र 24 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 5
इ॒दमि॑दमे॒वास्य॑ रू॒पं भ॑वति॒ तेनै॑नं॒ सं ग॑मयति । इषं॒ मह॒ ऊर्ज॑मस्मै दुहे॒ यो॒जं पञ्चौ॑दनं॒ दक्षि॑णाज्योतिषं॒ ददा॑ति ॥ (२४)
उस का रूप यही है. इसी से वह हम को फल प्राप्त कराता है. जो दक्षिणा से प्रकाशित अज का पंचौदन के रूप में दान करता है, वह अज दानकर्ता को अन्न के साथ बल प्रदान करता है. (२४)
That's the look of that. From this, he gives us fruit. The one who donates aj published from Dakshina in the form of Panchodana, he gives strength to the aj donor with food. (24)