हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 9.5.34

कांड 9 → सूक्त 5 → मंत्र 34 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 5
यो वै पि॒न्वन्तं॒ नाम॒र्तुं वेद॑ । पि॑न्व॒तींपि॑न्वतीमे॒वाप्रि॑यस्य॒ भ्रातृ॑व्यस्य॒ श्रिय॒मा द॑त्ते । ए॒ष वै पि॒न्वन्नाम॒र्तुर्यद॒जः पञ्चौ॑दनः । निरे॒वाप्रि॑यस्य॒ भ्रातृ॑व्यस्य॒ श्रियं॑ दहति॒ भव॑त्या॒त्मना॒ यो॒जं पञ्चौ॑दनं॒ दक्षि॑णाज्योतिषं॒ ददा॑ति ॥ (३४)
जो पिन्वंती नाम की ऋतु को जानता है, वह पिन्वंती को जानता हुआ ही अप्रिय शत्रुओं एवं बांधवों के ऐश्वर्य को ग्रहण करता है. यह जो पंचौदन रूप अज है, यही पिन्वंती नाम की ऋतु है. जो पुरुष दक्षिणा से प्रकाशित अज को पंचौदन के रूप में देता है, वह अपने अप्रिय शन्रुओं एवं बांधवों के ऐश्वर्य को अपनी शक्ति से जला देता है. (३४)
One who knows the season named Pinvanti, who knows Pinvanti, accepts the opulence of unpleasant enemies and dams. This is the panchaudan form aj, this is the season named Pinvanti. The man who gives the aj illuminated from dakshina in the form of Panchaudan burns the opulence of his unpleasant shanrus and bandhavas with his power. (34)