हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 8
इ॒ष्टं च॒ वा ए॒ष पू॒र्तं च॑ गृ॒हाणा॑मश्नाति॒ यः पूर्वोऽति॑थेर॒श्नाति॑ ॥ (१)
जो अतिथि से पहले भोजन कर लेता है, वह अपने में होने वाले इष्टापूर्त कर्मों का फल खा लेता है. संध्या आदि नित्य कर्म इष्ट और किसी प्रयोजन से किए जाने वाले यज्ञ आदि कर्म आपूर्त कहलाते हैं. (१)
He who eats before the guest eats, he eats the fruits of the favored deeds in him. Sandhya etc. are called daily karma favored and yajna etc. karma done for some purpose are called apoorta. (1)

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 8
पय॑श्च॒ वा ए॒ष रसं॑ च गृ॒हाणा॑मश्नाति॒ यः पूर्वोऽति॑थेर॒श्नाति॑ ॥ (२)
जो अतिथियों से पहले भोजन करता है, वह अपने घरों के दूध और रस को नष्ट करता है. (२)
The one who eats before the guests destroys the milk and juice of his houses. (2)

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 8
ऊ॒र्जां च॒ वा ए॒ष स्फा॒तिं च॑ गृ॒हाणा॑मश्नाति॒ यः पूर्वोऽति॑थेर॒श्नाति॑ ॥ (३)
जो व्यक्ति अतिथि से पहले भोजन कर लेता है, वह अपने घरों के बल और समृद्धि का नाश करता है. (३)
The person who eats before the guest destroys the strength and prosperity of his homes. (3)

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 8
प्र॒जां च॒ वा ए॒ष प॒शूंश्च॑ गृ॒हाणा॑मश्नाति॒ यः पूर्वोऽति॑थेर॒श्नाति॑ ॥ (४)
जो अतिथि से पहले भोजन करता है, वह अपने घरों की संतान और पशुओं का भक्षण करता है. (४)
He who eats before the guest eats the children and animals of his house. (4)

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 8
की॒र्तिं च॒ वा ए॒ष यश॑श्च गृ॒हाणा॑मश्नाति॒ यः पूर्वोऽति॑थेर॒श्नाति॑ ॥ (५)
जो अतिथि से पूर्व भोजन करता है, वह अपने घरों की कीर्ति और यश को समाप्त करता है. (५)
The one who eats before the guest ends the glory and fame of his houses. (5)

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 8
श्रियं॒ च॒ वा ए॒ष सं॒विदं॑ च गृ॒हाणा॑मश्नाति॒ यः पूर्वोऽति॑थेर॒श्नाति॑ ॥ (६)
जो अतिथि से पूर्व भोजन करता है, वह अपने घरों की श्री और सौमनस्य का विनाश करता है. (६)
He who eats before the guest destroys the shri and harmony of his houses. (6)

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 8
ए॒ष वा अति॑थि॒र्यच्छ्रोत्रि॑य॒स्तस्मा॒त्पूर्वो॒ नाश्नी॑यात् ॥ (७)
श्रोत्रिय ब्राह्मण ही वास्तव में अतिथि है. यजमान को चाहिए कि उस से पूर्व भोजन नहीं करे. (७)
Shrotriya Brahmin is actually the guest. The host should not eat before that. (7)

अथर्ववेद (कांड 9)

अथर्ववेद: | सूक्त: 8
अ॑शि॒ताव॒त्यति॑थावश्नीयाद्य॒ज्ञस्य॑ सात्म॒त्वाय॑ । य॒ज्ञस्यावि॑च्छेदाय॒ तद्व्र॒तम् ॥ (८)
अतिथि के भोजन कर लेने पर ही यजमान भोजन करे. यज्ञ के निर्वाह एवं यज्ञ का विच्छेद न होने के लिए ही यह व्रत है. (८)
The host should eat only after the guest has eaten. This fast is only for the sustenance of the yajna and the separation of the yajna. (8)
Page 1 of 2Next →