हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.103.2

मंडल 1 → सूक्त 103 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 103
स धा॑रयत्पृथि॒वीं प॒प्रथ॑च्च॒ वज्रे॑ण ह॒त्वा निर॒पः स॑सर्ज । अह॒न्नहि॒मभि॑नद्रौहि॒णं व्यह॒न्व्यं॑सं म॒घवा॒ शची॑भिः ॥ (२)
इंद्र ने असुर पीड़ित धरती को धारण एवं विस्तृत किया है, वज्ज से शत्रुओं को मारकर वर्षा का जल बहाया है, अंतरिक्ष में वर्तमान मेघ का वध किया है, रोहिण असुर को विदीर्ण किया है एवं अपने शीर्य से बाहुहीन वृत्र को समाप्त किया है. (२)
Indra has captured and expanded the asura-afflicted earth, killed the enemies with the vajj and poured out rainwater, killed the present cloud in space, separated the Rohin asura and eliminated the bahu-less vratra with his sheerity. (2)