ऋग्वेद (मंडल 1)
तत्त॑ इन्द्रि॒यं प॑र॒मं प॑रा॒चैरधा॑रयन्त क॒वयः॑ पु॒रेदम् । क्ष॒मेदम॒न्यद्दि॒व्य१॒॑न्यद॑स्य॒ समी॑ पृच्यते सम॒नेव॑ के॒तुः ॥ (१)
हे इंद्र! प्राचीन काल में क्रांतदर्शी स्तोताओं ने तुम्हारे इस प्रसिद्ध बल को सम्मुख धारण किया था. इंद्र की धरती पर रहने वाली एवं आकाश में रहने वाली ज्योतियां इस प्रकार मिल जाती हैं, जिस प्रकार युद्ध में विरोधी योद्धाओं के ध्वज मिल जाते हैं. (१)
O Indra! In ancient times, the revolutionary stos held this famous force of yours in front of them. The lights that live on the land of Indra and live in the sky are found in this way, just as the flags of the opposing warriors mingle in the war. (1)
ऋग्वेद (मंडल 1)
स धा॑रयत्पृथि॒वीं प॒प्रथ॑च्च॒ वज्रे॑ण ह॒त्वा निर॒पः स॑सर्ज । अह॒न्नहि॒मभि॑नद्रौहि॒णं व्यह॒न्व्यं॑सं म॒घवा॒ शची॑भिः ॥ (२)
इंद्र ने असुर पीड़ित धरती को धारण एवं विस्तृत किया है, वज्ज से शत्रुओं को मारकर वर्षा का जल बहाया है, अंतरिक्ष में वर्तमान मेघ का वध किया है, रोहिण असुर को विदीर्ण किया है एवं अपने शीर्य से बाहुहीन वृत्र को समाप्त किया है. (२)
Indra has captured and expanded the asura-afflicted earth, killed the enemies with the vajj and poured out rainwater, killed the present cloud in space, separated the Rohin asura and eliminated the bahu-less vratra with his sheerity. (2)
ऋग्वेद (मंडल 1)
स जा॒तूभ॑र्मा श्र॒द्दधा॑न॒ ओजः॒ पुरो॑ विभि॒न्दन्न॑चर॒द्वि दासीः॑ । वि॒द्वान्व॑ज्रि॒न्दस्य॑वे हे॒तिम॒स्यार्यं॒ सहो॑ वर्धया द्यु॒म्नमि॑न्द्र ॥ (३)
वज्रायुध एवं शक्तिसाध्य कार्य में श्रद्धा रखने वाले इंद्र ने दस्युओं के नगरों का विनाश करके विविध गमन किया था. हे वज्रधारी! हमारी स्तुतियों को समझते हुए तुम हमारे शत्रुओं पर आयुध छोड़ो एवं स्तुतिकर्तताओं का बल तथा यश बढ़ाओ. (३)
Indra, who believed in vajrayudha and shaktisadhya work, had made various walks by destroying the cities of the bandits. O thunderbolt! By understanding our praises, you must leave the arms upon our enemies and increase the strength and glory of the praises. (3)
ऋग्वेद (मंडल 1)
तदू॒चुषे॒ मानु॑षे॒मा यु॒गानि॑ की॒र्तेन्यं॑ म॒घवा॒ नाम॒ बिभ्र॑त् । उ॒प॒प्र॒यन्द॑स्यु॒हत्या॑य व॒ज्री यद्ध॑ सू॒नुः श्रव॑से॒ नाम॑ द॒धे ॥ (४)
वृत्रादि दस्यु को मारने के लिए घर से निकलते हुए वज्रधारी एवं शन्रुप्रेरक इंद्र ने जय लक्षण के लिए जो नाम धारण किया था, उससे बल का वर्णन करने वाले यजमान के लिए धनस्वामी इंद्र सूर्य रूप से मानवोपयोगी दिनरात के समूह का निर्माण करते हैं. (४)
On his way out of the house to kill the vritradi bandit, the Vajradhari and Shanrupretaka Indra, for the host describing the force from the name he had named for the Jai characterization, Dhanaswami Indra, the sun, forms a group of man-to-day nights. (4)
ऋग्वेद (मंडल 1)
तद॑स्ये॒दं प॑श्यता॒ भूरि॑ पु॒ष्टं श्रदिन्द्र॑स्य धत्तन वी॒र्या॑य । स गा अ॑विन्द॒त्सो अ॑विन्द॒दश्वा॒न्स ओष॑धीः॒ सो अ॒पः स वना॑नि ॥ (५)
हे यजमानो! इंद्र के प्रबुद्ध एवं विस्तृत शौर्य को देखो एवं इस पर श्रद्धा करो. इंद्र ने गायों, अश्वों ओषधियों, जलों एवं वनों को प्राप्त किया. (५)
O hosts! Look at indra's enlightened and detailed bravery and pay homage to it. Indra received cows, horses, herbs, water and forests. (5)
ऋग्वेद (मंडल 1)
भूरि॑कर्मणे वृष॒भाय॒ वृष्णे॑ स॒त्यशु॑ष्माय सुनवाम॒ सोम॑म् । य आ॒दृत्या॑ परिप॒न्थीव॒ शूरोऽय॑ज्वनो वि॒भज॒न्नेति॒ वेदः॑ ॥ (६)
अनेकविध कर्मयुक्त, देवों में श्रेष्ठ, इच्छापूर्ति में समर्थ एवं यथार्थ शक्ति वाले इंद्र के निमित्त हम सोम निचोड़ते हैं. जिस प्रकार बटमार जानेवाले भले मनुष्यों का धन छीन लेता है, उसी प्रकार शूर इंद्र धन का आदर करके यज्ञ न करने वालों का धन छीनकर उसे यजमानों को देने के लिए ले जाते हैं. (६)
For indra, who has many deeds, is superior to the gods, is capable of wanting and has real power, we squeeze the som. Just as the one who goes to batamara takes away the wealth of good men, so the brave Indra honors the wealth and takes away the money of those who do not perform yajna and takes it away to give it to the hosts. (6)
ऋग्वेद (मंडल 1)
तदि॑न्द्र॒ प्रेव॑ वी॒र्यं॑ चकर्थ॒ यत्स॒सन्तं॒ वज्रे॒णाबो॑ध॒योऽहि॑म् । अनु॑ त्वा॒ पत्नी॑र्हृषि॒तं वय॑श्च॒ विश्वे॑ दे॒वासो॑ अमद॒न्ननु॑ त्वा ॥ (७)
हे इंद्र! तुमने यह वीरता का कर्म किया जो सोते हुए अहि राक्षस को अपने वज्र द्वारा जगा दिया. तब तुम्हें हर्षित देखकर देवपत्नियों ने प्रसन्नता अनुभव की. गतिशील मरुद्गण एवं अन्य देव भी तुम्हारे साथ-साथ प्रसन्न हुए थे. (७)
O Indra! You did this act of valour which awakened the sleeping ahi demon with your thunderbolt. Then the wives rejoiced to see you rejoiced. The dynamic deserts and other gods were pleased with you. (7)
ऋग्वेद (मंडल 1)
शुष्णं॒ पिप्रुं॒ कुय॑वं वृ॒त्रमि॑न्द्र य॒दाव॑धी॒र्वि पुरः॒ शम्ब॑रस्य । तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः ॥ (८)
हे इंद्र! तुमने शुष्ण, पिप्रु एवं कुयव का वध तथा शंबर असुर के नगरों को विदीर्ण किया था. हमने इस स्तोत्र द्वारा जो चाहा है, उसकी पूजा मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, धरती और आकाश करें. (८)
O Indra! You killed Shushna, Pipru and Kuyava and destroyed the cities of Shambar Asura. Let friends, Varuna, Aditi, Sindhu, Prithvi and Akash worship what we have desired through this hymn. (8)