हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.104.4

मंडल 1 → सूक्त 104 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 104
यु॒योप॒ नाभि॒रुप॑रस्या॒योः प्र पूर्वा॑भिस्तिरते॒ राष्टि॒ शूरः॑ । अ॒ञ्ज॒सी कु॑लि॒शी वी॒रप॑त्नी॒ पयो॑ हिन्वा॒ना उ॒दभि॑र्भरन्ते ॥ (४)
उदक के मध्य में स्थित एवं दूसरों को परेशान करने के निमित्त इधर-उधर जाने वाले कुयव का स्थान जल में गुप्त था. वह शूर अपहृत जलों से बढ़ता एवं तेजस्वी बनता है. अंजसी, कुलिशी एवं वरिपत्नी नाम की नदियां अपने जल से उसे प्रसन्न करके धारण करती हैं. (४)
The place of the well that was located in the middle of the udak and going around to harass others was hidden in the water. It grows and becomes brighter than the shallow waters abducted. The rivers named Anjasi, Kulishi and Varitrini hold it by pleasing him with their waters. (4)