ऋग्वेद (मंडल 1)
अ॒सौ यः पन्था॑ आदि॒त्यो दि॒वि प्र॒वाच्यं॑ कृ॒तः । न स दे॑वा अति॒क्रमे॒ तं म॑र्तासो॒ न प॑श्यथ वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥ (१६)
हे देवगण! जो सूर्य आकाश में सततगामी मार्ग के समान सबके द्वारा देखे जाते हैं, उनका अतिक्रमण तुम भी नहीं कर सकते. हे मानवो! तुम उन्हें नहीं जानते. हे धरती और आकाश! हमारी बात जानो. (१६)
O Gods! You cannot transgress the suns which are seen by everyone like a continuous path in the sky. Oh, humans! You don't know them. O earth and sky! Know our point. (16)