ऋग्वेद (मंडल 1)
अ॒रु॒णो मा॑ स॒कृद्वृकः॑ प॒था यन्तं॑ द॒दर्श॒ हि । उज्जि॑हीते नि॒चाय्या॒ तष्टे॑व पृष्ट्याम॒यी वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥ (१८)
लाल रंग के वृक ने मुझे एक बार मार्ग में जाते हुए देखा. वह मुझे देखकर इस प्रकार ऊपर उछला, जिस प्रकार पीठ की वेदना वाला काम करते-करते सहसा उठ पड़ता है. हे धरती और आकाश! मेरे इस कष्ट को जानो. (१८)
The red kidney saw me walking down the road once. He looked at me and jumped up like this, just as the one who is in pain of his back usually gets up while doing the work. O earth and sky! Know this suffering of mine. (18)