ऋग्वेद (मंडल 1)
कद्व॑ ऋ॒तस्य॑ धर्ण॒सि कद्वरु॑णस्य॒ चक्ष॑णम् । कद॑र्य॒म्णो म॒हस्प॒थाति॑ क्रामेम दू॒ढ्यो॑ वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥ (६)
हे देवो! तुम्हारा सत्यधारण कहां है? वरुण की कृपादृष्टि कहां है? महान् अर्यमा का वह मार्ग कहां है, जिस पर चलकर हम पापबुद्धि शत्रुओं से दूर जा सकें? हे धरती और आकाश! हमारी इस बात को जानो. (६)
Oh, God! Where is your truth? Where is Varun's grace? Where is the path of the Great Arryama that we can walk away from sinful enemies? O earth and sky! Let's know this thing of ours. (6)