हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.110.6

मंडल 1 → सूक्त 110 → श्लोक 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 110
आ म॑नी॒षाम॒न्तरि॑क्षस्य॒ नृभ्यः॑ स्रु॒चेव॑ घृ॒तं जु॑हवाम वि॒द्मना॑ । त॒र॒णि॒त्वा ये पि॒तुर॑स्य सश्चि॒र ऋ॒भवो॒ वाज॑मरुहन्दि॒वो रजः॑ ॥ (६)
हम अंतरिक्ष संबंधी यज्ञ को नेता ऋभु.ओं को खुच नामक पात्र के समान घी से भरा हुआ हव्य देने के साथ ही ज्ञान भरी स्तुति करते हैं. उन्होंने जगतपालक सूर्य के समान संसार को पार करने की कुशलता एवं स्वर्गलोक का अन्न प्राप्त किया था. (६)
We praise the space-related yajna with knowledge as well as giving the leader sages a hand full of ghee like a character called khuch. He had the skill of crossing the world like the earthly sun and the food of paradise. (6)