हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.112.7

मंडल 1 → सूक्त 112 → श्लोक 7 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 112
याभिः॑ शुच॒न्तिं ध॑न॒सां सु॑षं॒सदं॑ त॒प्तं घ॒र्ममो॒म्याव॑न्त॒मत्र॑ये । याभिः॒ पृश्नि॑गुं पुरु॒कुत्स॒माव॑तं॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम् ॥ (७)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने जिन उपायों द्वारा शुचंति को धनसंपन्न एवं शोभनगृह का स्वामी बनाया, अत्रि को जलाने वाली तप्त अग्नि को सुखदायक बनाया एवं पृश्चिगु तथा पुरूकुत्स की रक्षा की, उन्हीं उपायों से यहां आओ. (७)
O Ashwinikumaro! Come here with the means by which you made Shuchanti the master of the rich and sovereign, the hot fire that burned the atri, and the protection of the prischigu and purukuts. (7)