हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.112.8

मंडल 1 → सूक्त 112 → श्लोक 8 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 112
याभिः॒ शची॑भिर्वृषणा परा॒वृजं॒ प्रान्धं श्रो॒णं चक्ष॑स॒ एत॑वे कृ॒थः । याभि॒र्वर्ति॑कां ग्रसि॒ताममु॑ञ्चतं॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम् ॥ (८)
हे कामवर्षक अश्विनीकुमारो! तुमने जिन कर्मो द्वारा पंगु परावृज को चलने में समर्थ, अंधे ऋजाश्च को देखने में कुशल, जानुरहित श्रोण को गतिशील एवं वृक द्वारा गृहीत पक्षिणी वर्त्तिका को मुक्त किया था, उन्हीं उपायों से आओ. (८)
O workman Ashwinikumaro! Come by the same means by which you were able to walk the paralysed paravrija, skilled in seeing the blind, the janus-free shron, the dynamic and the renally taken-up of the bird vartika. (8)