हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.112.9

मंडल 1 → सूक्त 112 → श्लोक 9 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 112
याभिः॒ सिन्धुं॒ मधु॑मन्त॒मस॑श्चतं॒ वसि॑ष्ठं॒ याभि॑रजरा॒वजि॑न्वतम् । याभिः॒ कुत्सं॑ श्रु॒तर्यं॒ नर्य॒माव॑तं॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम् ॥ (९)
हे जरारहित अश्चिनीकुमारो! जिन उपायों से सिंधु नदी को मधुर प्रवाह वाली, वशिष्ठ को प्रसन्न एवं कुत्स, श्रुतर्य तथा नर्य ऋषियों को सुरक्षित किया था, उन्ही उपायों सहित हमारे पास आओ. (९)
O unsatisfied aschinikumaro! Come to us with the same measures by which the Indus river was made of sweet flow, vasishta pleased and the sages of Kutsa, Shrutarya and Narya. (9)