ऋग्वेद (मंडल 1)
या॒व॒यद्द्वे॑षा ऋत॒पा ऋ॑ते॒जाः सु॑म्ना॒वरी॑ सू॒नृता॑ ई॒रय॑न्ती । सु॒म॒ङ्ग॒लीर्बिभ्र॑ती दे॒ववी॑तिमि॒हाद्योषः॒ श्रेष्ठ॑तमा॒ व्यु॑च्छ ॥ (१२)
हे उषा! तुम हमसे द्वेष करने वालों को दूर हटाने वाली, सत्य की पालनकर्त्री, यज्ञ के निमित्त उत्पन्न सुखयुक्त वचनों की प्रेरक, कल्याणसहिता एवं देवों के अभिलषित यज्ञ को धारण करने वाली हो, तुम उत्तम प्रकार से आज इस स्थान को प्रकाशित करो. (१२)
Oh, Usha! You are the one who removes those who hate us, the follower of the truth, the instigator of the happy words for the sake of the yajna, the welfare support and the yajna desired by the gods, you should illuminate this place today in the best way. (12)