ऋग्वेद (मंडल 1)
श॒तं मे॒षान्वृ॒क्ये॑ मामहा॒नं तमः॒ प्रणी॑त॒मशि॑वेन पि॒त्रा । आक्षी ऋ॒ज्राश्वे॑ अश्विनावधत्तं॒ ज्योति॑र॒न्धाय॑ चक्रथुर्वि॒चक्षे॑ ॥ (१७)
हे अश्विनीकुमारो! वृकों के निमित्त सौ मेषों को समर्पित करने वाले एवं दुःखदायी पिता द्वारा अंधे बनाए गए ऋजाश्च को तुमने नेत्र दिए एवं उस अंधे को संसार देखने योग्य बनाया. (१७)
O Ashwinikumaro! You gave eyes to the sage, who had dedicated a hundred aries to the elders and was made blind by the grieving Father, and made the blind man worthy of seeing the world. (17)