हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.117.18

मंडल 1 → सूक्त 117 → श्लोक 18 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 117
शु॒नम॒न्धाय॒ भर॑मह्वय॒त्सा वृ॒कीर॑श्विना वृषणा॒ नरेति॑ । जा॒रः क॒नीन॑ इव चक्षदा॒न ऋ॒ज्राश्वः॑ श॒तमेकं॑ च मे॒षान् ॥ (१८)
हे नेताओ एवं कामवर्षी अश्विनीकुमारो! दृष्टिहीन को पोषण का कारणभूत सुख देने की इच्छा से वृकी ने तुम्हें बुलाया था, क्योंकि ऋजाश्च ने उसी प्रकार एक सौ एक मेष के टुकड़े करके मुझे दिए हैं, जिस प्रकार यौवन प्राप्त कामुक किसी परस्त्री को बहुत सा धन देता है. (१८)
O leaders and businessman AshwiniKumaro! Vriki had called you out of the desire to give nourishment to the blind, because Rizash has given me a hundred and one pieces of Aries in the same way as the young erotic gives a lot of money to a stranger. (18)