हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.117.22

मंडल 1 → सूक्त 117 → श्लोक 22 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 117
आ॒थ॒र्व॒णाया॑श्विना दधी॒चेऽश्व्यं॒ शिरः॒ प्रत्यै॑रयतम् । स वां॒ मधु॒ प्र वो॑चदृता॒यन्त्वा॒ष्ट्रं यद्द॑स्रावपिक॒क्ष्यं॑ वाम् ॥ (२२)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने अथर्वा के पुत्र दधीचि के धड़ पर घोड़े का सिर लगाया था. उसने पूर्वकृत प्रतिज्ञा को सत्य बनाते हुए त्वष्टा से प्राप्त मधुविद्या तुम्हें बताई थी. हे दर्शनीयो! वही तुम लोगों से संबंधित प्रवर्ग्य नामक विद्या बनी. (२२)
O Ashwinikumaro! You put the head of the horse on the torso of Dadhichi, the son of Atharva. He told you the honey-learning he received from the skin, making the promise of the prophecy a truth. O you see! That is what became the science of the class related to you. (22)