ऋग्वेद (मंडल 1)
आ वां॒ रथो॑ अश्विना श्ये॒नप॑त्वा सुमृळी॒कः स्ववा॑ँ यात्व॒र्वाङ् । यो मर्त्य॑स्य॒ मन॑सो॒ जवी॑यान्त्रिवन्धु॒रो वृ॑षणा॒ वात॑रंहाः ॥ (१)
हे अश्चिनीकुमारो! तुम्हारा घोड़ों से चलने वाला सुखयुक्त एवं धनयुक्त रथ हमारे सामने आए. हे कामवर्षको! वह मानव मन के समान वेगवानू त्रिर्बधुर एवं वायु के समान तीव्रगामी है. (१)
O aschinikumaro! Your happy and rich horse-driven chariot came before us. O work years! It is as fast as the human mind and as fast as the wind. (1)