ऋग्वेद (मंडल 1)
अनु॑ त्वा म॒ही पाज॑सी अच॒क्रे द्यावा॒क्षामा॑ मदतामिन्द्र॒ कर्म॑न् । त्वं वृ॒त्रमा॒शया॑नं सि॒रासु॑ म॒हो वज्रे॑ण सिष्वपो व॒राहु॑म् ॥ (११)
हे इंद्र! विशाल शक्तिसंपन्न एवं सर्वत्र व्यापक धरती और आकाश ने तुम्हें वृत्रवध के पश्चात् प्रसन्न किया था. इसके बाद तुमने सर्वत्र वर्तमान एवं शोभन आहार वाले वृत्र असुर को महान् वज्र से मारकर पानी में गिरा दिया. (११)
O Indra! The vast mighty and wide earth and the sky everywhere pleased you after the revolution. After this, you killed the present and adorned asura with the great vritra and dropped it into the water. (11)