ऋग्वेद (मंडल 1)
तम॑स्य पृ॒क्षमुप॑रासु धीमहि॒ नक्तं॒ यः सु॒दर्श॑तरो॒ दिवा॑तरा॒दप्रा॑युषे॒ दिवा॑तरात् । आद॒स्यायु॒र्ग्रभ॑णवद्वी॒ळु शर्म॒ न सू॒नवे॑ । भ॒क्तमभ॑क्त॒मवो॒ व्यन्तो॑ अ॒जरा॑ अ॒ग्नयो॒ व्यन्तो॑ अ॒जराः॑ ॥ (५)
हम रात में अधिक प्रकाशित होने वाले और दिन में तेजशून्य रहने वाले अग्नि को वेदों के समीप हव्य देते हैं. पिता के समीप उत्तम एवं सुखदायक घर प्राप्त करने वाले पुत्र के समान अग्नि अन्न ग्रहण करते हैं. वे भक्त और अभक्त को जानते हुए भी दोनों की रक्षा करते हैं एवं हव्य का भक्षण करके सदा युवा बने रहते हैं. (५)
We give a greeting to the fire that is more illuminated at night and which is bright in the day near the Vedas. Those who get a good and soothing house near the Father receive fire food like a son. They protect both the devotee and the ungodly, knowing them and always remain young by eating the havya. (5)