ऋग्वेद (मंडल 1)
स हि शर्धो॒ न मारु॑तं तुवि॒ष्वणि॒रप्न॑स्वतीषू॒र्वरा॑स्वि॒ष्टनि॒रार्त॑नास्वि॒ष्टनिः॑ । आद॑द्ध॒व्यान्या॑द॒दिर्य॒ज्ञस्य॑ के॒तुर॒र्हणा॑ । अध॑ स्मास्य॒ हर्ष॑तो॒ हृषी॑वतो॒ विश्वे॑ जुषन्त॒ पन्थां॒ नरः॑ शु॒भे न पन्था॑म् ॥ (६)
जिस प्रकार वायु का वेग शब्द करता है, उसी प्रकार स्तुति योग्य अग्नि भी जलते समय शब्द करता है. अग्नि का यज्ञ उपजाऊ धरती पर करना चाहिए. हव्य एवं दानशील अग्नि यज्ञ के ध्वज के समान सर्वत्र पूजनीय हैं. जिस प्रकार लोग सुख पाने के लिए राजपथ पर चलते हैं, उसी प्रकार यजमानों को प्रसन्नता देने वाले अग्नि की सेवा की जाती है. (६)
Just as the word velocity of the wind does, so does the word praiseable fire when it is burning. The yagna of fire should be performed on fertile earth. The havya and dansheel are revered everywhere like the flag of agni yajna. Just as people walk on the highway for happiness, so the fire that gives happiness to the hosts is served. (6)