ऋग्वेद (मंडल 1)
त्वं नो॑ वायवेषा॒मपू॑र्व्यः॒ सोमा॑नां प्रथ॒मः पी॒तिम॑र्हसि सु॒तानां॑ पी॒तिम॑र्हसि । उ॒तो वि॒हुत्म॑तीनां वि॒शां व॑व॒र्जुषी॑णाम् । विश्वा॒ इत्ते॑ धे॒नवो॑ दुह्र आ॒शिरं॑ घृ॒तं दु॑ह्रत आ॒शिर॑म् ॥ (६)
हे वायु! तुमने सबसे पहले सोमरस पिया है. तुम्हीं सबसे पहले निचोड़े गए सोम को पीने योग्य हो. तुम पापरहित एवं यज्ञकर्ता यजमानों का हव्य स्वीकार करते हो. समस्त गाएं तुम्हारे निमित्त ही दूध और घी देती हैं. (६)
O Vayu! You drank somrus first. You are the first to drink the soma that is squeezed out. You accept the offerings of innocent and yajna performing hosts. All the cows give milk and ghee for you. (6)