ऋग्वेद (मंडल 1)
तुभ्यं॑ शु॒क्रासः॒ शुच॑यस्तुर॒ण्यवो॒ मदे॑षू॒ग्रा इ॑षणन्त भु॒र्वण्य॒पामि॑षन्त भु॒र्वणि॑ । त्वां त्सा॒री दस॑मानो॒ भग॑मीट्टे तक्व॒वीये॑ । त्वं विश्व॑स्मा॒द्भुव॑नात्पासि॒ धर्म॑णासु॒र्या॑त्पासि॒ धर्म॑णा ॥ (५)
हे वायु! उज्ज्वल, पवित्र एवं तेजपूर्ण सोम तुम्हें प्रमुदित करने के निमित्त आह्वान योग्य अग्नि के समीप जाते हैं एवं जलवर्षा की अभिलाषा करते हैं. अत्यंत भयभीत एवं बलहीन यजमान यज्ञादि विघातकों को भगाने के लिए तुम्हारी स्तुति करता है. हम हविधारणरूप धर्म से युक्त हैं, इसलिए तुम सभी भयों से हमारी रक्षा करो. (५)
O air! The bright, holy and bright mons go to the fire invocation to make you happy and desires to rain water. The very frightened and forceless host praises you for driving away the yagyaadi vighkars. We are possessed of religion in the form of a religion, so protect us from all your fears. (5)