हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.135.2

मंडल 1 → सूक्त 135 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 135
तुभ्या॒यं सोमः॒ परि॑पूतो॒ अद्रि॑भिः स्पा॒र्हा वसा॑नः॒ परि॒ कोश॑मर्षति शु॒क्रा वसा॑नो अर्षति । तवा॒यं भा॒ग आ॒युषु॒ सोमो॑ दे॒वेषु॑ हूयते । वह॑ वायो नि॒युतो॑ याह्यस्म॒युर्जु॑षा॒णो या॑ह्यस्म॒युः ॥ (२)
हे वायु! पत्थरों द्वारा पीसा गया, सबके द्वारा अभिलाषा करने योग्य एवं तेजस्वी सोमरस पात्र में आता है एवं निर्मल प्रकाश से युक्त होकर तुम्हें प्राप्त होता है. मनुष्यों में सोम यज्ञ के योग्य है. वही सब देवों के मध्य तुम्हें दिया जाता है. तुम हमारे यज्ञ में आने के लिए रथ में नियुत अश्व जोतकर प्रस्थान करो एवं हमारे ऊपर अनुग्रह करो. (२)
O air! Crushed by stones, desired by all and comes in a bright somras pot, and is filled with pure light and you receive it. In humans, the mon is worthy of yajna. The same is given to you among all the gods. To come to our yajna, go away with the horse appointed in the chariot and have mercy on us. (2)