ऋग्वेद (मंडल 1)
आ नो॑ नि॒युद्भिः॑ श॒तिनी॑भिरध्व॒रं स॑ह॒स्रिणी॑भि॒रुप॑ याहि वी॒तये॒ वायो॑ ह॒व्यानि॑ वी॒तये॑ । तवा॒यं भा॒ग ऋ॒त्वियः॒ सर॑श्मिः॒ सूर्ये॒ सचा॑ । अ॒ध्व॒र्युभि॒र्भर॑माणा अयंसत॒ वायो॑ शु॒क्रा अ॑यंसत ॥ (३)
हे वायु! तुम नियुत नामक सैकड़ों और हजारों घोड़ों से अपनी इच्छा पूर्ति और हव्य भक्षण के लिए हमारे यज्ञ में आओ. ऋत्विज् द्वारा अपने हाथ से निर्मित पवित्र एवं उदित सूर्य के समान तेजस्वी सोम तुम्हारा भाग है. (३)
O air! You come to our yagna to fulfill your wish and eat the havya from hundreds and thousands of horses called Nyut. The holy and rising sun created by Ritvija with his hand-made glorious mono is your part. (3)