हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.135.5

मंडल 1 → सूक्त 135 → श्लोक 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 135
आ वां॒ धियो॑ ववृत्युरध्व॒राँ उपे॒ममिन्दुं॑ मर्मृजन्त वा॒जिन॑मा॒शुमत्यं॒ न वा॒जिन॑म् । तेषां॑ पिबतमस्म॒यू आ नो॑ गन्तमि॒होत्या । इन्द्र॑वायू सु॒ताना॒मद्रि॑भिर्यु॒वं मदा॑य वाजदा यु॒वम् ॥ (५)
हे इंद्र और वायु! हमारे स्तोत्र तुम्हें यज्ञ में आने की प्रेरणा दें. जिस प्रकार तेज चलने वाले घोड़े की मालिश की जाती है, उसी प्रकार घर से कलश में रखकर यज्ञभूमि में लाए गए सोम को ऋत्विज्‌ रगड़ते हैं. तुम उनका सोमरस पिओ और हमारे यज्ञ की रक्षा के लिए पधारो. तुम दोनों अन्न देने वाले हो, इसलिए अपनी तृप्ति के लिए पत्थरों द्वारा पीसे गए सोम को पिओ. (५)
O Indra and the wind! May our hymns inspire you to come to the yagna. Just as the fast-moving horse is massaged, in the same way, the ritvis rub the som brought to the yagnabhoomi by placing it in the kalash from the house. You drink their somras and come to protect our yajna. You are both food givers, so drink the som powdered by stones for your fulfillment. (5)