हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.135.6

मंडल 1 → सूक्त 135 → श्लोक 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 135
इ॒मे वां॒ सोमा॑ अ॒प्स्वा सु॒ता इ॒हाध्व॒र्युभि॒र्भर॑माणा अयंसत॒ वायो॑ शु॒क्रा अ॑यंसत । ए॒ते वा॑म॒भ्य॑सृक्षत ति॒रः प॒वित्र॑मा॒शवः॑ । यु॒वा॒यवोऽति॒ रोमा॑ण्य॒व्यया॒ सोमा॑सो॒ अत्य॒व्यया॑ ॥ (६)
हे वायु! हमारे यज्ञ में निचोड़ा गया और अध्वर्युजनों द्वारा धारण किया हुआ उज्ज्वल सोम निश्चय ही तुम दोनों का है. तिरछे बिछे हुए कुशों पर रखा हुआ पर्याप्त सोमरस तुम्हारा है. वह समस्त देवों को लांघकर प्रचुर मात्रा में तुम्हें मिलता है. (६)
O air! The bright som, squeezed in our yajna and held by the adhwaryujans, certainly belongs to both of you. The enough somras placed on the slanted cushions is yours. He meets all the gods and you get it in abundance. (6)