ऋग्वेद (मंडल 1)
अद॑र्शि गा॒तुरु॒रवे॒ वरी॑यसी॒ पन्था॑ ऋ॒तस्य॒ सम॑यंस्त र॒श्मिभि॒श्चक्षु॒र्भग॑स्य र॒श्मिभिः॑ । द्यु॒क्षं मि॒त्रस्य॒ साद॑नमर्य॒म्णो वरु॑णस्य च । अथा॑ दधाते बृ॒हदु॒क्थ्यं१॒॑ वय॑ उप॒स्तुत्यं॑ बृ॒हद्वयः॑ ॥ (२)
सब लोगों ने देखा है कि महती उषा विस्तृत यज्ञ की ओर जाती है. गतिशील सूर्य का मार्ग आकाश प्रकाश से भर गया एवं सूर्यकिरणों से सभी को आंखें मिलीं. मित्र, अर्यमा और वरुण का आकाशरूपी घर उज्ज्वल प्रकाश से पूर्ण हो गया. हे मित्र एवं वरुण! तुम दोनों स्तुतियोग्य अन्न को अधिक मात्रा में धारण करो. (२)
Everyone has seen that the great Usha leads to the elaborate yajna. The path of the moving sun filled the sky with light and the sun's rays gave everyone's eyes. The sky-like house of friends, Aryama and Varuna was filled with bright light. Oh my friend and Varun! Both of you hold more of the praiseworthy food. (2)