ऋग्वेद (मंडल 1)
प्र सु ज्येष्ठं॑ निचि॒राभ्यां॑ बृ॒हन्नमो॑ ह॒व्यं म॒तिं भ॑रता मृळ॒यद्भ्यां॒ स्वादि॑ष्ठं मृळ॒यद्भ्या॑म् । ता स॒म्राजा॑ घृ॒तासु॑ती य॒ज्ञेय॑ज्ञ॒ उप॑स्तुता । अथै॑नोः क्ष॒त्रं न कुत॑श्च॒नाधृषे॑ देव॒त्वं नू चि॑दा॒धृषे॑ ॥ (१)
हे ऋत्विजो! नित्य रहने वाले मित्र और वरुण को लक्ष्य करके प्रशंसनीय एवं महान् स्तोत्र को आरंभ करो एवं उन्हें द्रव्य देने का निश्चय कर लो. वे यजमानों को सुख देते हैं एवं स्वादिष्ट हवि का भक्षण करके भली-भांति सुशोभित होते हैं. उन्हीं के लिए घी एकत्र किया जाता है एवं प्रत्येक यज्ञ में उनकी स्तुति की जाती है. उनका बल अलंघनीय है एवं उनके देव होने में किसी को संदेह नहीं है. (१)
Hey Ritvijo! Start the praiseworthy and great hymn by targeting the eternal friend and Varuna and decide to give them the money. They give pleasure to the hosts and are well-beautified by eating delicious hani. Ghee is collected for them and they are praised in each yagna. Their strength is inviolable and no one doubts about them being gods. (1)
ऋग्वेद (मंडल 1)
अद॑र्शि गा॒तुरु॒रवे॒ वरी॑यसी॒ पन्था॑ ऋ॒तस्य॒ सम॑यंस्त र॒श्मिभि॒श्चक्षु॒र्भग॑स्य र॒श्मिभिः॑ । द्यु॒क्षं मि॒त्रस्य॒ साद॑नमर्य॒म्णो वरु॑णस्य च । अथा॑ दधाते बृ॒हदु॒क्थ्यं१॒॑ वय॑ उप॒स्तुत्यं॑ बृ॒हद्वयः॑ ॥ (२)
सब लोगों ने देखा है कि महती उषा विस्तृत यज्ञ की ओर जाती है. गतिशील सूर्य का मार्ग आकाश प्रकाश से भर गया एवं सूर्यकिरणों से सभी को आंखें मिलीं. मित्र, अर्यमा और वरुण का आकाशरूपी घर उज्ज्वल प्रकाश से पूर्ण हो गया. हे मित्र एवं वरुण! तुम दोनों स्तुतियोग्य अन्न को अधिक मात्रा में धारण करो. (२)
Everyone has seen that the great Usha leads to the elaborate yajna. The path of the moving sun filled the sky with light and the sun's rays gave everyone's eyes. The sky-like house of friends, Aryama and Varuna was filled with bright light. Oh my friend and Varun! Both of you hold more of the praiseworthy food. (2)
ऋग्वेद (मंडल 1)
ज्योति॑ष्मती॒मदि॑तिं धार॒यत्क्षि॑तिं॒ स्व॑र्वती॒मा स॑चेते दि॒वेदि॑वे जागृ॒वांसा॑ दि॒वेदि॑वे । ज्योति॑ष्मत्क्ष॒त्रमा॑शाते आदि॒त्या दानु॑न॒स्पती॑ । मि॒त्रस्तयो॒र्वरु॑णो यात॒यज्ज॑नोऽर्य॒मा या॑त॒यज्ज॑नः ॥ (३)
यजमान ने अन्ने के तेज से युक्त, समस्त लक्षणों तथा स्वर्ग प्रदान करने वाली यज्ञवेदी अपने आप बनाई है. तुम दोनों एकत्र होकर प्रतिदिन सावधान रहो एवं प्रतिदिन यज्ञवेदी पर आकर तेज और बल प्राप्त करो. तुम अदिति के पुत्र एवं समस्त देवों के पालक हो. मित्र, वरुण और अर्यमा लोगों को अपने-अपने काम में लगाते हैं. (३)
The host has created the yajnaveda on his own, containing the brightness of the one, which gives all the signs and the heavens. Get you both together and be careful every day and come on the yagna vedi every day and get fast and strength. You are the son of Aditi and the guardian of all the gods. Friends, Varun and Aryama engage people in their respective work. (3)
ऋग्वेद (मंडल 1)
अ॒यं मि॒त्राय॒ वरु॑णाय॒ शंत॑मः॒ सोमो॑ भूत्वव॒पाने॒ष्वाभ॑गो दे॒वो दे॒वेष्वाभ॑गः । तं दे॒वासो॑ जुषेरत॒ विश्वे॑ अ॒द्य स॒जोष॑सः । तथा॑ राजाना करथो॒ यदीम॑ह॒ ऋता॑वाना॒ यदीम॑हे ॥ (४)
नीचे की ओर मुंह करके पीने वाले मित्र और वरुण के लिए सोमपान प्रसन्नता प्रदान करे. समस्त देव अपनी सेवा के उपयुक्त एवं तेजस्वी सोम को प्रसन्तापूर्वक पिएं. हे समान प्रीतयुक्त मित्र एवं वरुण! तुम यज्ञ के स्वामी हो. तुम हमारी प्रार्थना के अनुसार कार्य करो. (४)
May Sompan provide happiness to a friend who drinks facing downwards and for Varuna. May all the gods drink the appropriate and bright soma of your service. O lovely friend and Varun! You are the lord of the yajna. You act according to our prayers. (4)
ऋग्वेद (मंडल 1)
यो मि॒त्राय॒ वरु॑णा॒यावि॑ध॒ज्जनो॑ऽन॒र्वाणं॒ तं परि॑ पातो॒ अंह॑सो दा॒श्वांसं॒ मर्त॒मंह॑सः । तम॑र्य॒माभि र॑क्षत्यृजू॒यन्त॒मनु॑ व्र॒तम् । उ॒क्थैर्य ए॑नोः परि॒भूष॑ति व्र॒तं स्तोमै॑रा॒भूष॑ति व्र॒तम् ॥ (५)
हे मित्र एवं वरुण! तुम अपनी सेवा करने वाले, द्वेषरहित एवं हव्यदाता यजमान की समस्त पापों से रक्षा करो. अर्यमा सरल स्वभाव वाले यजमान को देखते हैं एवं उसकी रक्षा करते हैं. यजमान मंत्र द्वारा मित्र और वरुण का यज्ञ करता है एवं स्तुतियों के द्वारा उसको सुशोभित करता है. (५)
Oh my friend and Varun! Protect the host who serves you, without malice, and the giver of all sins. Aryama sees and protects a simple-natured host. The host performs the yajna of the friend and Varuna by the mantra and adorns him with praises. (5)
ऋग्वेद (मंडल 1)
नमो॑ दि॒वे बृ॑ह॒ते रोद॑सीभ्यां मि॒त्राय॑ वोचं॒ वरु॑णाय मी॒ळ्हुषे॑ सुमृळी॒काय॑ मी॒ळ्हुषे॑ । इन्द्र॑म॒ग्निमुप॑ स्तुहि द्यु॒क्षम॑र्य॒मणं॒ भग॑म् । ज्योग्जीव॑न्तः प्र॒जया॑ सचेमहि॒ सोम॑स्यो॒ती स॑चेमहि ॥ (६)
मैं अभीष्ट फल तथा सुख के दाता महान् एवं प्रकाशयुक्त सूर्य, धरती, आकाश, मित्र, वरुण और रुद्र को नमस्कार करता हूं. हे होताओ! इस समय इंद्र, अग्नि, दीप्तिसंपन्न अर्यमा एवं भग की स्तुति करो. इनकी कृपा से हम पूजा से घिरे हुए एवं सोमरस द्वारा रक्षित रहेंगे. (६)
I salute the great and luminous Sun, earth, sky, Mitra, Varuna and Rudra, the giver of desired fruits and happiness. Hey Hotas! Praise Indra, Agni, Brilliant Aryama and Bhaga at this time. By his grace we will be surrounded by worship and protected by somrus. (6)
ऋग्वेद (मंडल 1)
ऊ॒ती दे॒वानां॑ व॒यमिन्द्र॑वन्तो मंसी॒महि॒ स्वय॑शसो म॒रुद्भिः॑ । अ॒ग्निर्मि॒त्रो वरु॑णः॒ शर्म॑ यंस॒न्तद॑श्याम म॒घवा॑नो व॒यं च॑ ॥ (७)
हमने अपनी स्तुतियों से मरुदगणों को प्रसन्न कर लिया है. इंद्र हम पर प्रसन्न हैं. हम देवों की रक्षा चाहते है. इंद्र, अग्नि, मित्र और वरुण हमें सुख दें. हम उनके दिए हुए अन्न से सुख भोगें. (७)
We have pleased the deserters with Our praises. Indra is pleased with us. We want to protect the gods. May Indra, Agni, Friends and Varuna give us happiness. Let us enjoy the food they have given us. (7)