ऋग्वेद (मंडल 1)
अ॒यं मि॒त्राय॒ वरु॑णाय॒ शंत॑मः॒ सोमो॑ भूत्वव॒पाने॒ष्वाभ॑गो दे॒वो दे॒वेष्वाभ॑गः । तं दे॒वासो॑ जुषेरत॒ विश्वे॑ अ॒द्य स॒जोष॑सः । तथा॑ राजाना करथो॒ यदीम॑ह॒ ऋता॑वाना॒ यदीम॑हे ॥ (४)
नीचे की ओर मुंह करके पीने वाले मित्र और वरुण के लिए सोमपान प्रसन्नता प्रदान करे. समस्त देव अपनी सेवा के उपयुक्त एवं तेजस्वी सोम को प्रसन्तापूर्वक पिएं. हे समान प्रीतयुक्त मित्र एवं वरुण! तुम यज्ञ के स्वामी हो. तुम हमारी प्रार्थना के अनुसार कार्य करो. (४)
May Sompan provide happiness to a friend who drinks facing downwards and for Varuna. May all the gods drink the appropriate and bright soma of your service. O lovely friend and Varun! You are the lord of the yajna. You act according to our prayers. (4)