हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.138.2

मंडल 1 → सूक्त 138 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 138
प्र हि त्वा॑ पूषन्नजि॒रं न याम॑नि॒ स्तोमे॑भिः कृ॒ण्व ऋ॒णवो॒ यथा॒ मृध॒ उष्ट्रो॒ न पी॑परो॒ मृधः॑ । हु॒वे यत्त्वा॑ मयो॒भुवं॑ दे॒वं स॒ख्याय॒ मर्त्यः॑ । अ॒स्माक॑माङ्गू॒षान्द्यु॒म्निन॑स्कृधि॒ वाजे॑षु द्यु॒म्निन॑स्कृधि ॥ (२)
हे पूषा! लोग जैसे शीघ्रगामी घोड़े की प्रशंसा करते हैं, उसी प्रकार मैं यज्ञस्थल में शीघ्र आने के लिए तुम्हारी स्तुति करता हूं. तुम हमें ऊंट के समान संग्राम के पार पहुंचाते हो, इसलिए मैं युद्ध में आने के लिए तुम्हारी स्तुति करता हूं. मैं मरणधर्मा तुम्हारी मित्रता पाने के लिए सुख के उत्पादक तुम्हारा आह्वान करता हूं. हमारे आह्वान को सफल करके हमें युद्ध में विजयी बनाओ. (२)
O God! Just as people praise the early horse, so I praise you for coming early to the place of yajna. You bring us across the battle like a camel, so I praise you for coming to war. I call upon you, the creator of happiness, to find your friendship in death. Make us victorious in the war by succeeding our call. (2)