हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.141.12

मंडल 1 → सूक्त 141 → श्लोक 12 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 141
उ॒त नः॑ सु॒द्योत्मा॑ जी॒राश्वो॒ होता॑ म॒न्द्रः श‍ृ॑णवच्च॒न्द्रर॑थः । स नो॑ नेष॒न्नेष॑तमै॒रमू॑रो॒ऽग्निर्वा॒मं सु॑वि॒तं वस्यो॒ अच्छ॑ ॥ (१२)
कया अत्यंत द्योतमान, गतिशील अश्वों वाले, देवों को बुलाने वाले, आनंदपूर्ण स्वर्णरथ के स्वामी, अमोघशक्तिसंपन्न एवं निवासयोग्य अग्नि हमारा आह्वान सुनेंगे? कया वह हमें सरलता से प्राप्त एवं सबके द्वारा अभिलषित स्वर्ग में हमारे कमों द्वारा ले जाएंगे? (१२)
Will the most promiscuous, dynamic horses, those who call the gods, the masters of the blissful golden chariot, the incompetent and habitable fires hear our call? Will He lead us to the heavens easily received and desired by all by our servants? (12)