हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.142.10

मंडल 1 → सूक्त 142 → श्लोक 10 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 142
तन्न॑स्तु॒रीप॒मद्भु॑तं पु॒रु वारं॑ पु॒रु त्मना॑ । त्वष्टा॒ पोषा॑य॒ वि ष्य॑तु रा॒ये नाभा॑ नो अस्म॒युः ॥ (१०)
हमारी कामना करने वाले त्वष्टा अपने आप ही हमारी पुष्टि और समृद्धि के लिए मेघ के नाभि स्थानीय अद्भुत, व्यापक एवं अगणित लोगों के कल्याण करने वाले जल को बरसावें. (१०)
May the navel of the cloud automatically rain down the water that is good to the local wonderful, comprehensive and countless people for our confirmation and prosperity. (10)