ऋग्वेद (मंडल 1)
स जाय॑मानः पर॒मे व्यो॑मन्या॒विर॒ग्निर॑भवन्मात॒रिश्व॑ने । अ॒स्य क्रत्वा॑ समिधा॒नस्य॑ म॒ज्मना॒ प्र द्यावा॑ शो॒चिः पृ॑थि॒वी अ॑रोचयत् ॥ (२)
वे अग्नि विस्तृत आकाश देश में उत्पन्न होकर सबसे प्रथम मातरिश्वा के समीप पहुंचे. इसके पश्चात् वे ईधन द्वारा भली-भांति बढ़े और प्रबल यज्ञकर्म द्वारा उनकी ज्वाला ने धरती और आकाश को प्रकाशित किया. (२)
Those fires originated in the vast sky country and first came close to Matrishwa. After this, they grew well by fuel, and by a strong sacrificial act, their flame illuminated the earth and the sky. (2)