हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.146.5

मंडल 1 → सूक्त 146 → श्लोक 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 146
दि॒दृ॒क्षेण्यः॒ परि॒ काष्ठा॑सु॒ जेन्य॑ ई॒ळेन्यो॑ म॒हो अर्भा॑य जी॒वसे॑ । पु॒रु॒त्रा यदभ॑व॒त्सूरहै॑भ्यो॒ गर्भे॑भ्यो म॒घवा॑ वि॒श्वद॑र्शतः ॥ (५)
यह अग्नि दसों दिशाओं में देखने की इच्छा के विषय बनते हैं. इसी कारण अग्नि जयशील एवं स्तुतियोग्य बनते हैं. ये महान्‌ देवादि एवं क्षुद्र मनुष्यादि सबके जीवन हेतु हैं. जिस प्रकार पिता बच्चे का पालन करता है, उसी प्रकार अन्नयुक्त एवं सबके दर्शनीय अग्नि अनेक स्थानों में यजमान का पालन एवं रक्षा करते हैं. (५)
This fire becomes the subject of the desire to see in ten directions. That is why fires become joyful and praiseworthy. These great gods and small man are for everyone's life. Just as the father follows the child, so the food-rich and all-seeing fires follow and protect the host in many places. (5)