ऋग्वेद (मंडल 1)
मरु॑तः॒ पिब॑त ऋ॒तुना॑ पो॒त्राद्य॒ज्ञं पु॑नीतन । यू॒यं हि ष्ठा सु॑दानवः ॥ (२)
हे मरुद्गण! पोत्र नामक ऋत्विक् द्वारा दिया हुआ सोमरस ऋतु के साथ पिओ. तुम शोभन दानशील हो. तुम मेरे यज्ञ को पवित्र करो. (२)
O deserters! Drink with somras season given by a ritwik named Potra. You are sociable. You sanctify my yajna. (2)