हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.152.5

मंडल 1 → सूक्त 152 → श्लोक 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 152
अ॒न॒श्वो जा॒तो अ॑नभी॒शुरर्वा॒ कनि॑क्रदत्पतयदू॒र्ध्वसा॑नुः । अ॒चित्तं॒ ब्रह्म॑ जुजुषु॒र्युवा॑नः॒ प्र मि॒त्रे धाम॒ वरु॑णे गृ॒णन्तः॑ ॥ (५)
सूर्य अश्व एवं लगाम के अभाव में भी शीघ्र गमन करते हैं, जोर से गरजते हैं एवं क्रमशः ऊपर चढ़ते जाते हैं. लोग इन अचिंत्य एवं महान्‌ कर्मो को मित्र एवं वरुण का समझकर बार- बार स्तुतियां करते हुए सेवा करते हैं. (५)
Even in the absence of a horse and a bridle, the sun moves quickly, roars loudly and climbs up gradually. People serve these unsung and great deeds as friends and varunas and praise them again and again. (5)