ऋग्वेद (मंडल 1)
विष्णो॒र्नु कं॑ वी॒र्या॑णि॒ प्र वो॑चं॒ यः पार्थि॑वानि विम॒मे रजां॑सि । यो अस्क॑भाय॒दुत्त॑रं स॒धस्थं॑ विचक्रमा॒णस्त्रे॒धोरु॑गा॒यः ॥ (१)
हे मानवो! मैं उन वीर कर्मो को शीघ्र कहूंगा. उन्होंने पृथ्वी और तीनों लोकों को नापा था एवं अति विस्तृत अंतरिक्ष को स्थिर किया था. अनेक प्रकार से स्तुतिपात्र उन विष्णु ने तीन चरण रखे थे. (१)
Oh, humans! I will say those heroic deeds soon. He measured the earth and the three realms and stabilized the vast space. In many ways, he was praised by Vishnu who had three stages. (1)
ऋग्वेद (मंडल 1)
प्र तद्विष्णुः॑ स्तवते वी॒र्ये॑ण मृ॒गो न भी॒मः कु॑च॒रो गि॑रि॒ष्ठाः । यस्यो॒रुषु॑ त्रि॒षु वि॒क्रम॑णेष्वधिक्षि॒यन्ति॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑ ॥ (२)
जिस विष्णु के तीन विशाल पादक्षेपों में संपूर्ण लोग समा जाते हैं, उस विष्णु की स्तुति लोग उसकी शक्ति के कारण उसी प्रकार करते हैं, जिस प्रकार किसी पहाड़ पर रहने वाले लोग हिंसक, जंगली पशु की शक्ति की प्रशंसा करते हैं. (२)
The vishnu in whose three giant footprints the whole people are absorbed, that Vishnu is praised by the people because of his power in the same way that the people living on a mountain admire the power of a violent, wild animal. (2)
ऋग्वेद (मंडल 1)
प्र विष्ण॑वे शू॒षमे॑तु॒ मन्म॑ गिरि॒क्षित॑ उरुगा॒याय॒ वृष्णे॑ । य इ॒दं दी॒र्घं प्रय॑तं स॒धस्थ॒मेको॑ विम॒मे त्रि॒भिरित्प॒देभिः॑ ॥ (३)
पर्वत के समान ऊंचे स्थान पर रहने वाले, अनेक लोगों द्वारा प्रशंसित एवं कामवर्षक विष्णु को हमारे मनोहर स्तोत्र एवं यज्ञकर्म से उत्पन्न शक्ति प्राप्त हो. उन्होंने अत्यंत विस्तृत एवं स्थिर इन तीनों को अकेले ही तीन कदम रखकर नाप लिया था. (३)
May Vishnu, who lives in a place as high as a mountain, admired by many people and a workman, receive the power generated by our beautiful hymns and yagnakarmas. He measured these three very elaborate and stable by taking three steps alone. (3)
ऋग्वेद (मंडल 1)
यस्य॒ त्री पू॒र्णा मधु॑ना प॒दान्यक्षी॑यमाणा स्व॒धया॒ मद॑न्ति । य उ॑ त्रि॒धातु॑ पृथि॒वीमु॒त द्यामेको॑ दा॒धार॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑ ॥ (४)
जिस विष्णु के मधु से पूर्ण एवं क्षीणतारहित तीन चरणों ने अन्न द्वारा मनुष्यों को प्रसन्न किया है, उन्होंने अकेले ही तीनों धातुओं, धरती, आकाश एवं समस्त लोकों को धारण किया है. (४)
Vishnu, whose three stages, complete and without decay from honey, have pleased man through food, he alone possesses all the three metals, the earth, the sky and all the realms. (4)
ऋग्वेद (मंडल 1)
तद॑स्य प्रि॒यम॒भि पाथो॑ अश्यां॒ नरो॒ यत्र॑ देव॒यवो॒ मद॑न्ति । उ॒रु॒क्र॒मस्य॒ स हि बन्धु॑रि॒त्था विष्णोः॑ प॒दे प॑र॒मे मध्व॒ उत्सः॑ ॥ (५)
स्वयं को विष्णु रूप में परिवर्तित करके इच्छुक लोग विष्णु के जिस प्रिय एवं सबके द्वारा सेवनीय अविनाशी ब्रह्मलोक में तृप्ति प्राप्त करते हैं, मैं उसी लोक को प्राप्त करूं. वे सबके बंधु हैं एवं उनके स्थान पर अमृत बरसता है. (५)
By converting themselves into Vishnu, the people who are interested in the beloved and indestructible Brahmaloka, which is beloved of Vishnu and consumed by all, I will get the same loka. They are all brothers and nectar is showered in their place. (5)
ऋग्वेद (मंडल 1)
ता वां॒ वास्तू॑न्युश्मसि॒ गम॑ध्यै॒ यत्र॒ गावो॒ भूरि॑शृङ्गा अ॒यासः॑ । अत्राह॒ तदु॑रुगा॒यस्य॒ वृष्णः॑ पर॒मं प॒दमव॑ भाति॒ भूरि॑ ॥ (६)
हे यजमान एवं यजमान पत्नी! हम तुम दोनों के उस लोक में जाने की अभिलाषा करते हैं, जहां बड़े सीगों वाली गाएं निवास करती हैं. अनेक लोगों द्वारा प्रशंसित विष्णु का परम पद सभी प्रकार सुशोभित होता है. (६)
O host and host wife! We wish both of you to go to the realm where the cows with big seags live. The ultimate verse of Vishnu, admired by many people, is adorned in all manner. (6)