ऋग्वेद (मंडल 1)
प्र विष्ण॑वे शू॒षमे॑तु॒ मन्म॑ गिरि॒क्षित॑ उरुगा॒याय॒ वृष्णे॑ । य इ॒दं दी॒र्घं प्रय॑तं स॒धस्थ॒मेको॑ विम॒मे त्रि॒भिरित्प॒देभिः॑ ॥ (३)
पर्वत के समान ऊंचे स्थान पर रहने वाले, अनेक लोगों द्वारा प्रशंसित एवं कामवर्षक विष्णु को हमारे मनोहर स्तोत्र एवं यज्ञकर्म से उत्पन्न शक्ति प्राप्त हो. उन्होंने अत्यंत विस्तृत एवं स्थिर इन तीनों को अकेले ही तीन कदम रखकर नाप लिया था. (३)
May Vishnu, who lives in a place as high as a mountain, admired by many people and a workman, receive the power generated by our beautiful hymns and yagnakarmas. He measured these three very elaborate and stable by taking three steps alone. (3)