हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 155
प्र वः॒ पान्त॒मन्ध॑सो धियाय॒ते म॒हे शूरा॑य॒ विष्ण॑वे चार्चत । या सानु॑नि॒ पर्व॑ताना॒मदा॑भ्या म॒हस्त॒स्थतु॒रर्व॑तेव सा॒धुना॑ ॥ (१)
हे अध्वर्यु लोगो! तुम स्तुति चाहने वाले, महावीर इंद्र एवं विष्णु के निमित्त पीने के योग्य सोमरस विशेष रूप से तैयार करो. वे दोनों अपराजेय, महान्‌ एवं पर्वतों के ऊपर इस प्रकार स्थित हैं, जिस प्रकार कोई इच्छित स्थान पर पहुंचने में समर्थ घोड़े पर बैठता है. (१)
O adhwaryu logo! You prepare a special drinkable somras for the sake of those who seek praise, Mahavira, Indra and Vishnu. They are both unbeatable, noble and situated on top of the mountains in such a way that one sits on a horse capable of reaching the desired place. (1)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 155
त्वे॒षमि॒त्था स॒मर॑णं॒ शिमी॑वतो॒रिन्द्रा॑विष्णू सुत॒पा वा॑मुरुष्यति । या मर्त्या॑य प्रतिधी॒यमा॑न॒मित्कृ॒शानो॒रस्तु॑रस॒नामु॑रु॒ष्यथः॑ ॥ (२)
हे इष्टप्रद इंद्र व विष्णु! यज्ञ से बचे हुए सोमरस को पीने वाले यजमान तुम्हारे यज्ञस्थल पर तेजस्वी आगमन का आदर करते हैं. तुम दोनों यजमान के लिए यज्ञफल रूप में देने योग्य अन्न शत्रुपराजयकारी अग्नि से सदा दिलाते हो. (२)
O godly Indra and Vishnu! The hosts who drink the leftover somras from the yajna revere your glorious arrival at the place of yajna. Both of you always provide food for the host in the form of yajnaphal with the enemy's glorious fire. (2)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 155
ता ईं॑ वर्धन्ति॒ मह्य॑स्य॒ पौंस्यं॒ नि मा॒तरा॑ नयति॒ रेत॑से भु॒जे । दधा॑ति पु॒त्रोऽव॑रं॒ परं॑ पि॒तुर्नाम॑ तृ॒तीय॒मधि॑ रोच॒ने दि॒वः ॥ (३)
यजमान द्वारा दी गई सोमरस रूपी आहुतियां इंद्र की शक्ति को बढ़ाती हैं, वह सब प्राणियों को पुत्रादि उत्पादन में समर्थ करने एवं रक्षा पाने के उद्देश्य से उसी शक्ति को सबकी माता तुल्य धरती और आकाश में रखते हैं. पुत्र का नाम निम्न, पिता का उच्च और तीसरे नाती का नाम प्रकाशयुक्त आकाश में है. (३)
The somaras-like offerings given by the host enhance the power of Indra, he puts the same power in the earth and sky as everyone's mother in order to enable all beings to produce and protect them in the production of sons. The son's name is low, the father's high and the third grandson's name is in the light sky. (3)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 155
तत्त॒दिद॑स्य॒ पौंस्यं॑ गृणीमसी॒नस्य॑ त्रा॒तुर॑वृ॒कस्य॑ मी॒ळ्हुषः॑ । यः पार्थि॑वानि त्रि॒भिरिद्विगा॑मभिरु॒रु क्रमि॑ष्टोरुगा॒याय॑ जी॒वसे॑ ॥ (४)
हम सबके स्वामी, पालक, हिंसक एवं नित्य तरुण विष्णु के पराक्रमों की स्तुति करते हैं. उन्होंने तीनों लोकों की प्रशंसनीय रक्षा के लिए तीन चरण रखकर पृथ्वी आदि समस्त लोकों की परिक्रमा कर ली थी. (४)
We all praise the mighty of lord, guardian, violent and eternal young Vishnu. He had circumnavigated all the realms of the earth, etc., by placing three steps for the admirable defense of the three realms. (4)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 155
द्वे इद॑स्य॒ क्रम॑णे स्व॒र्दृशो॑ऽभि॒ख्याय॒ मर्त्यो॑ भुरण्यति । तृ॒तीय॑मस्य॒ नकि॒रा द॑धर्षति॒ वय॑श्च॒न प॒तय॑न्तः पत॒त्रिणः॑ ॥ (५)
मनुष्य विभूतियों का वर्णन करते हुए स्वर्गदर्शी विष्णु के दो चरणक्षेपों को ही प्राप्त करते हैं. उनके तीसरे पादक्षेप को मनुष्य क्या आकाश में उड़ने वाले पक्षी भी नहीं पा सकते. (५)
Man attains only the two steps of the heavenly Vishnu while describing the vibhutis. On their third footing, man cannot even find birds flying in the sky. (5)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 155
च॒तुर्भिः॑ सा॒कं न॑व॒तिं च॒ नाम॑भिश्च॒क्रं न वृ॒त्तं व्यती॑ँरवीविपत् । बृ॒हच्छ॑रीरो वि॒मिमा॑न॒ ऋक्व॑भि॒र्युवाकु॑मारः॒ प्रत्ये॑त्याह॒वम् ॥ (६)
विष्णु ने अपनी विशेष गतियों द्वारा काल के चौरासी भागों को चक्र के समान गोलाकार में घुमा रखा है. वह विशाल शरीर वाले, विविध प्राणियों को विभक्त करने वाले, स्तुतिसंपन्न, तरुण एवं कौमार्यरहित हैं. वे युद्ध में गमन करते हैं. (६)
Vishnu, through his special motions, has rotated the eighty-four parts of time in a circle like a circle. He is a large-bodied, dividing diverse beings, praising, young and without virginity. They go to war. (6)