ऋग्वेद (मंडल 1)
यु॒क्तो ह॒ यद्वां॑ तौ॒ग्र्याय॑ पे॒रुर्वि मध्ये॒ अर्ण॑सो॒ धायि॑ प॒ज्रः । उप॑ वा॒मवः॑ शर॒णं ग॑मेयं॒ शूरो॒ नाज्म॑ प॒तय॑द्भि॒रेवैः॑ ॥ (३)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा पार पहुंचाने वाला रथ तुग्रपुत्र के उद्धार के लिए अश्वयुक्त था. तुमने उस रथ को अपनी शक्ति से समुद्र के बीच स्थापित किया. जिस प्रकार शूर व्यक्ति युद्ध जीत कर गतिशील अश्वों द्वारा अपने घर में पहुंचता है, उसी प्रकार हम तुम्हारी शरण में आए हैं. (३)
O Ashwinikumaro! The chariot that led you across was a horseman for the salvation of the Son of Tugrah. You set that chariot in the middle of the sea with your power. Just as a brave man wins a war and reaches his home by moving horses, so we have come to your refuge. (3)