ऋग्वेद (मंडल 1)
पञ्चा॑रे च॒क्रे प॑रि॒वर्त॑माने॒ तस्मि॒न्ना त॑स्थु॒र्भुव॑नानि॒ विश्वा॑ । तस्य॒ नाक्ष॑स्तप्यते॒ भूरि॑भारः स॒नादे॒व न शी॑र्यते॒ सना॑भिः ॥ (१३)
पांच ऋतुरूपी अरों वाला सूर्य का संवत्सररूपी चक्र घूमता है. समस्त प्राणी उसी में रहते हैं. उसका भारी अक्ष कभी नहीं थकता. उसकी नाभि सदा एक सी रहती है, कभी टूटती नहीं. (१३)
The sun's contastric cycle of five seasonal rays rotates. All beings live in it. His heavy axis never tires. His navel is always the same, never breaking. (13)