हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.164.14

मंडल 1 → सूक्त 164 → श्लोक 14 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 164
सने॑मि च॒क्रम॒जरं॒ वि वा॑वृत उत्ता॒नायां॒ दश॑ यु॒क्ता व॑हन्ति । सूर्य॑स्य॒ चक्षू॒ रज॑सै॒त्यावृ॑तं॒ तस्मि॒न्नार्पि॑ता॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑ ॥ (१४)
सदा एक सी नाभि वाला जरारहित संवत्सररूपी पहिया बार-बार घूमता है. पांच लोकपाल और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, निषाद पांच वर्ण, ये दस मिलकर विस्तृत धरती को धारण करते हैं. नेत्ररूपी सूर्यमंडल वर्षा के जल से पूर्ण बादलों से घिर जाता है. समस्त प्राणी उसी में छिप जाते हैं. (१४)
The unmanned contraptional wheel with the same navel always rotates repeatedly. The five Ombudsmen and brahmins, Kshatriyas, Vaishyas, Shudras, Nishads, five varnas, together these ten hold the vast earth. The ophthalmosphere is surrounded by clouds full of rain water. All beings hide in it. (14)